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निर्भया केस : ६ साल बाद और गंभीर हुई देश की हालत, रेप केसेस में वृद्धि

दिल्‍ली में हर दूसरे दिन एक घटना सामने आती है. कभी राजनीती से जुडी तो कभी एक्सीडेंट. कभी हत्या कभी चोरी और हर खबर से ऊपर रेप केस. लेकिन 6 साल पहले हुए एक वारदात आज भी दिल को दहला देने के लिए काफी है. 16 दिसंबर अब सिर्फ तारीख नहीं रही दर्द बन चुकी है.आज निर्भया कांड की छठी बरसी है। 16 दिसंबर 2012 को निर्भया का गैंगरेप किया गया था। दरिंदगी के बाद निर्भया ने 13 दिनों तक मौत से लड़ाई लड़ी थी। निर्भया की मौत ने महिला सुरक्षा को लेकर एक बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया था। लाखों लोग सड़कों पर उतरे थे और सरकार को सख्त कानून बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा था।इसी दिन दिल्‍ली की एक घटना ने देशभर के लोगों के रौंगटे खड़े कर दिए थे. बलात्‍कार हुआ था, दरिंदगी की सारी हदें पार की गईं, इंसानियत पर दाग लगा और लोगों का गुस्‍सा ऐसा फूटा की देश के कोने-कोने से लोग इंडिया गेट पर जमा हुए. निर्भया रेप के बाद कानून सख्त तो हुआ पर सुरक्षा फिर भी नहीं मिल पायी लड़कियों को. ऐसा क्यों ?

निर्भया के पिता का कहना है कि रिव्यू पिटिशन खारिज होने के बाद अभी तक क्यूरेटिव पिटिशन दाखिल नहीं किया गया है और न ही दया याचिका दाखिल की गई है। ऐसे में वे इस तथ्य को लेकर अंधेरे में हैं कि आखिर निर्भया के गुनहगारों को फांसी पर कब लटकाया जाएगा।मामले में चारों मुजरिमों को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है और तीन मुजरिमों की रिव्यू पिटिशन खारिज हो चुकी है। जबकि चौथे अक्षय की ओर से रिव्यू पिटिशन दाखिल नहीं की गई। मुजरिमों के वकील ने बताया कि उनकी ओर से क्यूरिटिव पिटिशन दाखिल किया जाना है। वहीं एक मुजरिम ने खुद को जुवेनाइल घोषित करने की अर्जी दाखिल कर रखी है।


निर्भया के पिता ने बताया कि 9 जुलाई को जब रिव्यू पिटिशन सुप्रीम कोर्ट से खारिज किया गया, उसके बाद क्यूरेटिव पिटिशन दाखिल किए जाने का प्रावधान बचा हुआ है। लेकिन आखिर कब तक क्यूरेटिव पिटिशन दाखिल किए जाने का इंतजार किया जाएगा। जिस अदालत ने पहली बार फांसी की सजा सुनाई थी, उसी अदालत के सामने डेथ वॉरंट जारी करने की उन्होंने गुहार लगाई थी और उन्हें 18 दिसंबर को बुलाया गया है। तमाम अर्जी खारिज होने के बाद संबंधित निचली अदालत मुजरिम के नाम डेथ वॉरंट जारी करता है। जब मामला कहीं भी पेंडिंग न हो तो सरकार की ओर से निचली अदालत को सूचित किया जाता है कि अमुक मुजरिम की अर्जी कहीं भी पेंडिंग नहीं है, लिहाजा उसे कब फांसी पर चढ़ाया जाए। इसके बाद निचली अदालत डेथ वॉरंट जारी करता है और उसमें फांसी दिए जाने की तारीख और समय तय की जाती है.

निर्भया कांड के बाद महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और दुष्कर्म जैसे मामलों में कानून और सख्त कर दिया गया. इसके बावजूद राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के साल 2016-17 के आकंड़ों में महिला संबंधी अपराधों में अकेले दिल्ली में 160.4 फीसद का इजाफा रिकॉर्ड किया गया.2012 में दुष्कर्म के 706 मामले दर्ज किए गए. 2014 में इनमें तीन गुना इजाफा हुआ और आंकड़ा 2166 पहुंच गया. 2015 में भी दुष्कर्म के 2199 मामले दर्ज हुए. साल दर साल दुष्कर्म के मामलों में इजाफा हो रहा है. महिला संबंधी अन्य अपराधों में भी 50 फीसद से ज्यादा का इजाफा रिकॉर्ड किया गया है. 2012 में ऐसे 208 मामले दर्ज हुए थे, जो 2015 में बढ़कर 1492 हो गए.

अब दुष्कर्म के मामलों में सात साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है. सामुहिक दुष्कर्म में 20 साल से आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है. इतने सब के बाद भी क्यों डर नहीं बैठ रहा इन दरिंदो के मन में? हज़ारो ऐसे केस हैं जिन पर सुनवाई नहीं होती. कभी बचो के साथ तो कभी बूढ़ों के साथ, आये दिन ये घटनाएं सामने आती हैं मगर इतने कठोर कानूनों के बाद भी ये थमने का नाम नहीं ले रहे.

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