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Pulwama Terror Attack : जो होना था हो गया अब बस बयानबाजी और घोषणा 1998 में करगिल युद्ध के बाद जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा ने कई आत्मघाती हमले किए थे.

जम्मू-कश्मीर के ख़ुफ़िया विभाग का मानना है कि कश्मीर के पुलवामा में अर्धसैनिक बलों पर हुए वीभत्स हमले (Pulwama Terror Attack) को टाला जा सकता था. इस हमले में सीआरपीएफ़ के 34 जवानों की मौत हुई है और कई ज़ख़्मी हैं.
एक शीर्ष सुरक्षा अधिकारी ने बताया  कि पूरे देश की सुरक्षा एजेंसियों को 12 फ़रवरी को अलर्ट किया गया था कि जैश-ए-मोहम्मद सैन्य बलों पर बड़ा हमला कर सकता है. पुलवामा में हुए हमले (Pulwama Terror Attack) की ज़िम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद ने ही ली है.


सूत्रों से जानकारी मिली है कि हमले के तुरंत बाद पुलिस महानिदेशक दिलबाग सिंह ने नई दिल्ली में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को भी यही बात बताई है.
जैश-ए-मोहम्मद ने एक वीडियो जारी किया था जिसमें अफ़ग़ानिस्तान में इसी तरह का हमला दिखाया गया था. संगठन ने दावा किया था, “जुल्म का बदला लेने के लिए” वह कश्मीर में इसी तरह से हमला करेगा. इसी वीडियो के आधार पर राज्य के ख़ुफ़िया विभाग ने जानकारियां साझा की थीं.

पहचान गुप्त रखे जाने की शर्त पर एक सुरक्षा अधिकारी ने बताया कि अगर स्टेट इंटेलिजेंस की इनपुट को नई दिल्ली के साथ पहले से ही शेयर किया गया था तो 14 फ़रवरी को पुलवामा में हुआ हमला साफ़ तौर पर सुरक्षा में एक बड़ी चूक है.

1998 में करगिल युद्ध के बाद जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा ने कई आत्मघाती हमले किए थे. मगर इन आत्मघाती बम हमलों को अंजाम देने वाले चरमपंथी पाकिस्तानी नागरिक हुआ करते थे. यह पहला मौक़ा है जब जैश ने दावा किया है कि पुलवामा के स्थानीय लड़के आदिल उर्फ़ वक़ास कमांडों ने इस गतिविधि को अंजाम दिया.
यह हमला इतना ख़तरनाक था कि इसकी चपेट में आई एक बस लोहे और रबर के ढेर में तब्दील हो गई है. इस बस में कम से कम 44 सीआरपीएफ़ जवान सवार थे.

प्रशासन का कहना है कि यह काफ़िला जम्मू से श्रीनगर जा रहा था. इन जवानों को आगामी संसद और विधानसभा चुनाव से पहले श्रीनगर और दक्षिण कश्मीर ज़िलों में तैनात किया जाना था. जान गंवाने वाले अधिकतर जवान बिहार के रहने वाले थे.
सरकारी सूत्रों का कहना है कि भारत के गृह मंत्री राजनाथ सिंह शुक्रवार को कश्मीर का दौरा करके घाटी में सुरक्षा की स्थिति की समीक्षा कर सकते हैं. उनका यह दौरा चुनाव की तैयारियों के मद्देनज़र भी अहम है.

उनकी यात्रा से पहले राज्य पुलिस ने केंद्र को बताया कि राज्य की ख़ुफ़िया एजेंसियों ने पहले ही इस तरह के हमले को लेकर चेताया था. ऐसे में राजनाथ सिंह का दौरा काफ़ी अहम हो जाता है.

कश्मीर में रक्षा विशेषज्ञ सुरक्षा बलों पर हुए इस हमले को भारत सरकार की पूरी नाकामी बता रहे हैं.

पूर्व पुलिस उप-महानिदेशक और लेखक अली मोहम्मद वटाली ने कहा, “इस तरह के हमलों से यह संदेश निकलकर आता है कि चरमपंथियों को मारने की नीति नाकाम रही है. इस तरह का हमला समस्या को जटिल करता है.”
मोहम्मद वटाली ने कहा, “भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कई बार कहा कि कुछ महीनों में कश्मीर में चरमपंथी ख़त्म हो जाएंगे. मगर उनकी बात सही साबित नहीं हुई. कश्मीर में स्थिति ख़राब होती जा रही है. सेना को इस्तेमाल करने का विकल्प इसे संभालने में नाकाम रहा है. कश्मीर में हालात सामान्य नहीं कहे जा सकते.”

मोहम्मद वटाली से जब पूछा गया कि पिछले कुछ सालों में तो चरमपंथी आत्मघाती या फ़िदायीन हमले नहीं करते थे, तो उन्होंने कहा, “यही तो मैं बता रहा हूं. एक समय ऐसा था जब इस तरह के हमले होना आम बात हो गई थी. मगर हम एक बार फिर उसी दौर में प्रवेश कर रहे हैं जब ऐसे हमले हो रहे हैं.”

पूर्व पुलिस महानिदेशक एम.एम. खजूरिया कहते हैं कि कश्मीर में जो चल रहा है, वो ऐसी लड़ाई नहीं है जो एक-दो महीनों में ख़त्म हो जाए. वह मानते हैं कि ये एक लंबा संघर्ष है.

खजूरिया कहते हैं, “ये लड़ाई महीनों में ख़त्म नहीं हो सकती. जबसे इसमें वहाबी (मुस्लिमों का एक वर्ग जिनकी संख्या सऊदी अरब में ज़्यादा है) फ़ैक्टर जुड़ा है, नया खेल शुरू हो गया है. आज जो हुआ, वो एक बड़ा हमला था. दूसरी बड़ी बात ये है कि इस हमले को, जैसा कि रिपोर्टें बता रही हैं, एक स्थानीय लड़के ने अंजाम दिया है. स्थानीय लड़के वहाबी और आईएसआईएस की विचारधारा से जुड़ रहे हैं. ये स्थिति चिंताजनक है. भारत सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए और समाधान खोजना चाहिए.”

उन्होंने आगे कहा, “भारत सरकार को कश्मीर में लोगों से बात करनी चाहिए. उन लोगों से संपर्क करना चाहिए जो नाराज़ हैं. और ये भी महत्वपूर्ण है कि हम उन लोगों के बारे में सोचें जो कि कश्मीर में आतंकवाद के संपर्क में नहीं आए हैं. इस मामले में राजनीति करना हमारे देश के लिए ठीक नहीं है. हमें लोगों से संवाद करना होगा.”

चरमपंथ को मिलेगा बढ़ावा

90 के दशक में जब कश्मीर में चरमपंथ का उदय हुआ था, चरमपंथी इस तरह के हमले करते रहे थे. 2005 तक यह सिलसिला चला. गुरुवार को हुए चरमपंथी हमले ने कश्मीर में सुरक्षा की स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
पिछले साल सुरक्षा बलों ने कश्मीर में दावा किया था कि उन्होंने 250 से अधिक चरमपंथियों को मारा है, जिनमें शीर्ष नेता भी शामिल थे. पिछले कुछ सालों से दक्षिण कश्मीर को चरमपंथ का नया अड्डा माना जा रहा है.
2016 में हिज़्ब कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद 2018 तक दक्षिण कश्मीर में स्थानीय लड़के बड़ी संख्या में चरमपंथी संगठनों में भर्ती हुए हैं.

पत्रकार और टिप्पणीकार हारून रेशी कहते हैं कि गुरुवार का हमला आगे चलकर कश्मीर में चरमपंथ को बढ़ावा देगा.
उन्होंने कहा, ”चरमपंथियों का आज का हमला उनके लिए प्रोत्साहन होगा क्योंकि पिछले दो सालों में यहां सेना मज़बूत बनकर उभरी है. सुरक्षा एजेंसियों ने कश्मीर में करीब 500 चरमपंथियों को मारा है.”

हारून रेशी ने कहा, ”हाल ही में बीजेपी के वरिष्ठ नेता राम माधव ने कहा था कि सुरक्षा बल कश्मीर में चरमपंथ ख़त्म करने में सफल हुए हैं. लेकिन ये हमला दिखाता है कि कश्मीर में भले ही कम चरमपंथी सक्रिय हों लेकिन वो घातक साबित हो सकते हैं. जैसा कि आज का हमला एक 21 साल के नौजवान ने किया था और आप देख सकते हैं कि वो कितना ख़तरनाक साबित हुआ है. ये हमला एक बड़ा संदेश है.”

गुरुवार को हुए इस हमले के बाद केंद्र सरकार ने जांच की जिम्मेदारी एनआईए को सौंपी थी. इस टीम में फ़ॉरेंसिक एक्सपर्ट्स और आईजी रैंक के एक अधिकारी के साथ कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं.
रिपोर्ट्स के मुताबिक केंद्र सरकार के निर्देश के बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी की एक टीम शुक्रवार सुबह दिल्ली से श्रीनगर के लिए रवाना होगी.
इस बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर कहा है कि उन्होंने पुलवामा हमले के बारे में गृह मंत्री राजनाथ सिंह और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से बात की है.

गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि जो भी संभव होगा, वो कार्रवाई की जाएगी.

-अनिल अनूप

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