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केरल : विकास और परंपरा के बीच खींचातानी

केरल के सबरीमाला मंदिर में हर आयु की महिलाओं के प्रवेश को लेकर दिए आदेश पर पुनर्विचार करते हुए दायर 64 याचिकाओं पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। लेकिन उपरोक्त मामले में बड़ा परिवर्तन तब आ गया जब त्रवणकोर देवासम बोर्ड ने अपने पुरानी दलील को छोड़ते हुए न्यायालय में यह कह दिया कि मंदिर बोर्ड सभी आयु की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश देने के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का सम्मान करता है।

गौरतलब है कि जबसे देश के सर्वोच्च न्यायालय ने सबरीमाला मंदिर में सभी आयु की महिलाओं को प्रवेश करने का आदेश दिया था तभी से विवाद खड़ा हो गया था। पिछले करीब 800 वर्षों से चली आई परम्परा को न्यायालय के फैसले के बाद दो महिलाओं ने मंदिर में प्रवेश कर तोड़ा था उसके बाद राज्य भर में रोष प्रदर्शन शुरू हो गए थे।

सदियों से चली आ रही परंपरा को तोडऩे से विवाद तो खड़ा होना ही था क्योंकि परंपरा में आस्था रखने वालों को लगता है कि उनकी भावनाओं से खिलवाड़ हो रहा है। लेकिन दूसरा पहलू यह भी है कि परंपरा कभी खत्म नहीं हो सकती। समय और परिस्थितियों के साथ इसमें समाज बदलाव करता रहता है और जो समाज परिवर्तन के लिए तैयार नहीं होता उसे समय पीछे छोड़ जाता है। औरतों से संबंधित कई परंपराओं में हिन्दू समाज ने समय के साथ बदलाव पहले भी किया है जैसे सती प्रथा, स्त्री शिशु की भ्रूण हत्या, दहेज इत्यादि। इसके अलावा हिन्दू समाज में जैसे नर बलि, छुआछूत इत्यादि परम्पराओं का विरोध किया गया और समाज सफल भी रहा है।

विकास और परंपरा को लेकर समाज की उलझनों को लेकर श्यामाचरण दुबे ने अपनी पुस्तक ‘समय और संस्कृति’ में इस प्रकार लिखा है ‘यह कह देना कि परंपरा मूल्यवान है काफी नहीं है। परंपरा में अपनी विडंबनाएं और विरोधाभास भी होते हैं। नर बलि, सती प्रथा, स्त्री शिशु की भू्रण हत्या, दहेज और उनके अभाव में स्त्री के साथ नृशंस व्यवहार, अस्पृश्यता आदि ऐसी परंपराएं हैं जिनका समर्थन नहीं किया जा सकता। परंतु ऐसी भी स्वत: स्फूर्त और समाज-जन्य परंपराएं हैं, जो आज के माहौल की अमान्य परंपराओं का पहले से विरोध करती आयी हैं। असहमति, विरोध और सुधार की इन परंपराओं को पुष्ट करना आवश्यक है।

कानून की अपनी सीमाएं होती हैं, पर शिक्षा, संचार और सामाजिक आंदोलनों से ये बुराइयां भी दूर की जा सकती हैं। पहली उलझन उस समय उत्पन्न होती है, जब हम परंपरा का प्रतिरूप निर्धारित करने का प्रयत्न करते हैं। आरंभ किस काल और स्थिति से करें? आद्य संस्कृति के संकलक आखेटक स्तर से? या, किसी स्वर्ण युग के कल्पित चित्र से? एक गत्यात्मक प्रक्रिया के किस स्तर पर इस प्रतिरूप को धनीभूत और स्थिरीकृत करें? जहां परंपरा की एक से अधिक धाराएं हों। उनका तुलनात्मक मूल्यांकन किस आधार पर किया जाए? उनमें प्रमुख कौन है, गौण कौन-इसका निर्धारण कैसे हो? परंपरा की हर छवि एक पुनर्निर्माण होती है। काल, संदर्भ और आवश्यकताएं उसके निर्धारण को प्रभावित करती हैं।

अहं की टकराहट छवि को विकृत कर सकती है। दूरदर्शिता, विवेक और संयम का अभाव अनेक समस्याओं को जन्म दे सकता है। दूसरा खतरा है परंपरा के अति रहस्यीकरण का, जो उन्हें ऐसे ढंग से प्रस्तुत करता है, जिसका कोई तथ्यात्मक तथा ऐतिहासिक आधार नहीं होता। यह प्रवृत्ति अनावश्यक क्षेत्रीय सामुदायिक और सांप्रदायिक तनाव पैदा कर सकती है। शुद्ध परंपरा की खोज हमें अंधी गली में ले जा सकती है, क्योंकि संस्कृतियों के बीच व्यापक आदान-प्रदान एक स्वीकृत ऐतिहासिक प्रक्रिया है। क्या संपर्क सूत्रों की अवहेलना की जा सकती है? फिर कोई भी परंपरा संसार की सभी समस्याओं का हल प्रस्तुत नहीं कर सकती।

कुछ नयी समस्याएं नये हलों की मांग करती हैं। विश्वव्यापी समस्याओं के विश्वव्यापी हल जरूरी होते हैं जो किसी एक परंपरा में उपलब्ध नहीं होते। परंपरा का राजनीतिकरण जो सत्य, अर्धसत्य और असत्य का सहारा लेता है, तत्कालिक राजनीतिक लाभ तो दे सकता है पर वह वैमनस्य, टकराव और हिंसा को भी प्रेरित कर सकता है। संस्कृतियों की स्वायत्तता स्वीकार करने का पूरा लाभ तभी होगा जब हम अंतर-सांस्कृतिक सौहार्द और सहयोग के सेतुओं का निर्माण भी करेंगे।’
परम्पराओं को जब केवल कानून के माध्यम से हम बदलने की कोशिश करेंगे तो हम एक सीमा से आगे सफल नहीं हो पायेंगे। हमें समाज को शिक्षित करने के साथ-साथ कुरीतियों विरुद्ध अभियान चलाकर जागरुक करना होगा और विश्वास दिलाना होगा कि न तो उसके अस्तित्व को कोई खतरा है और न ही आस्था से कोई खिलवाड़ हो रहा है, तभी समाज विकास की राह पर आगे बढ़ पायेगा।

– अनिल अनूप

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